कहां सोए पड़े हैं देश के रहबर ,,,,,हरियाणा के ऐसे गांव जहां आजादी के 72 साल बाद भी गांवों में पानी नहीं और स्कूल भी बिना पानी और बिजली के चलते हैं

कहां सोए पड़े हैं देश के रहबर ,,,,,हरियाणा के ऐसे गांव जहां आजादी के 72 साल बाद भी गांवों में पानी नहीं और स्कूल भी बिना पानी और बिजली के चलते हैं
कहां सोए पड़े हैं देश के रहबर ,,,,,हरियाणा के ऐसे गांव जहां आजादी के 72 साल बाद भी गांवों में पानी नहीं और स्कूल भी बिना पानी और बिजली के चलते हैं
Punjab E News

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फगवाड़ा एक्सप्रेस न्यूज़ ,,,,,,देश की राजधानी दिल्ली से महज़ 100 किलोमीटर दूर हरियाणा के नूंह ज़िले का भादस गांव. इस गांव का दुर्भाग्य ये है कि आज़ादी के 72 सालों बाद भी यहां लोगों के पास पीने को पानी नहीं है.

1200 परिवार की आबादी वाले इस गांव में लोग ख़ुद पैसे देकर पानी का टैंकर मंगवाते हैं. पानी को रखने के लिए इन परिवारों ने घर में सीमेंट से बड़े-बड़े चैंबर बनवाए हैं जिसे यहां बोल चाल की भाषा में 'कुंडा' कहते हैं.


नूंह, पानी संकट

लेकिन कई ऐसे ग़रीब परिवार भी हैं जो पानी के टैंकर नहीं ख़रीद सकते. और ना ही उनके घरों में कुंडा का इंतज़ाम है. ऐसे में इन घरों की महिलाएं मीलों दूर चलकर पानी भरने जाती है.

दरअसल, मेवात इलाक़े का भूमिगत पानी बेहद खारा है. इस पानी को ना ही पिया जा सकता है और ना ही इसे दूसरे कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

लिहाज़ा इस इलाक़े के लोग पानी के टैंकर ख़रीदने और मीलों दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं.

ये कहानी सिर्फ़ भादस गांव की नहीं बल्कि नूंह के नगीना ब्लॉक में पड़ने वाले लगभग सभी गांव की है.

नूंह, पानी संकट

भादस गांव के कीचड़ से सने रास्तों पर चलते हुए हमारी मुलाक़ात 80 साल की महिला भजरी से हुई. जब हमने उनसे पानी की समस्या के बारे में पूछा तो झट से मेरा हाथ पकड़ लिया और बोलीं घणी परेशानी आए बेटी. पाणी ठीक करा दे बस्ती का.

अपनी लड़खड़ाती आवाज़ में वो कहती हैं, ''एक बूंद पानी ना है घर में, काहे से नहाये, काहे से पिबे, काहे से रोज़ा राखे. टैंकर नू बुलाये रहे लेकिन ना आया. पूरे घर में देख लो एक बूंद पानी ना है. 15 दिन बाद रमज़ान आ रहा है. गर्मी होती है रोज़ा में, मन होता है कि नहा लें. गंदगी तो नापाक है. लेकिन नहा ही ना पाएँ तो पाक कहां से होवे. घर में हमें 2000 हज़ार पेंशन आवे है, बेटा खोखा (चाय की दुकान) चलात है. कैसे पैसो जुटा कर पानी पीये हैं ये हम ही जाने. 5 दिन हो गए टैंकर वाला पाणी ना दिया. गर्मी में तो मनमाना पैसा देने पर भी पाणी ना मिलेगा. महीने में 5000 रुपये तो देने पड़े हैं. ''

नूंह, पानी संकटImage captionभादस गांव में रहने वाली 80 साल की भजरी

पास में रखे एक मटके की ओर इशारा करते हुए वह कहती हैं बेटी देख ले बस यही पानी बचो है. आपणा पानी तो हो नहीं हो पा रहो इन पशुअन ने क्या पिलाऊं.

अपनी बात बीच में ही रोक कर वो अपने पोते को धूप में ना खेलने के लिए कहती हैं ताकि उसे प्यास कम लगे. उन्हें पता है कि यह मटका भर पानी ही उनके टैंकर के इंतज़ार का सहारा है.

भादस गांव में सरकार ने कुछ कुंडे बनवाए हैं लेकिन ये गांव से काफ़ी दूरी पर हैं और इनमें कभी पानी रहता है तो कभी नहीं. लिहाज़ा गांव के लोगों को ख़ुद ही पानी का टैंकर मंगवाना पड़ता है.

नूंह

इस गांव में रहने वाले सैफ़ुल कहते हैं कि यहां तो हम तेल जैसे पानी का इस्तेमाल करते हैं. जैसे सब्ज़ी में आप लोग बचा-बचा कर तेल डालते हो हम पानी बचा बचाकर पीते हैं. मज़दूरी से जो पैसा मिलता है उससे दो जून की रोटी नहीं पहले पानी ख़रीदते हैं.

15 साल पुरानी योजना लेकिन अब भी प्यासा मेवात

अक्तूबर साल 2004 में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने मेवात के लिए 425 करोड़ की लागत वाली रेनीवेल योजना का शुभारंभ किया. इस योजना के तहत यमुना के पानी को बूस्टरों और पाइपों के मध्यम से गांवों तक पहुंचाना था.

इसके बाद राज्य में कांग्रेस की सरकार आई और इस परियोजना का नाम बदलकर 'राजीव गांधी पेयजल योजना' रखा गया. योजना के मुताबिक़ प्रतिदिन एक व्यक्ति को 55 लीटर पानी देने का प्रावधान रखा गया.

नूंह, पानी संकटImage captionपानी के टैंकर

गांव और इलाक़ों के हिसाब से इस परियोजना को दो चरणों में बांटा गया और पहले चरण में क़रीब ढाई करोड़ की राशि ख़र्च की गई है. इसके बाद योजना ठंडे बस्ते में चली गई.

राज्य में अब पांच साल से बीजेपी की सरकार है. इन 15 सालों में सरकारें बदलीं योजनाओं के नाम बदल दिए गए लेकिन अगर कुछ नहीं बदला तो लोगों के हालात.

गांव के इस हालात से जुड़े कुछ सवाल लेकर हम गुरूग्राम के सांसद राव इंद्रजीत सिंह से मिलने उनके कार्यालय पहुंचे. तो उन्होंने वक़्त देने के बावजूद हमसे बात करने से इंकार कर दिया.

मजबूरी, उम्मीद और मायूसी

भादस बड़ा गांव है. इसका एक हिस्सा ऊंचाई पर बसा है जिसे यहां आम भाषा में खेड़ा कहते हैं. गांव में पानी की पाइपें बिछाई गई हैं. लेकिन इन पाइपों में पानी नहीं है. इसके बारे में पूछने पर एक गांव वाले ने बताया कि 10 दिन पहले पाइप बिछी है और हमें बीजेपी से उम्मीद है कि वो हमें पानी देगी.

यहां रहने वाली ज़रीना की आंखों में पाइप की बातें करते हुए एक उम्मीद की चमक दिखाई पड़ती है. वह कहती हैं कि ''जेई साहब ने पाइप बिछवा दी तो पानी भी आ ही जाएगा. बीजेपी हमें पानी देगी.''

अपनी गोद में बच्चा संभालते हुए मायूस चेहरा लिए ज़रीना कहती हैं, ''सरकारी कुंडा में भी पानी कभी आता है कभी नहीं आता. बिजली तो यहां आती ही नहीं है और कई दिनों-हफ़्तों तक पानी भी चैंबर में नहीं छोड़ते. फिर गांव में किसी से उधार पानी लेते हैं जब नीचे से भर लाते हैं तो लौटाना पड़ता है. ग़रीब आदमी हैं हम मर्द मज़दूर है. काम मिल गया तो पानी ख़रीद लेते हैं नहीं तो यही ही पी रहे हैं. ''

नूंह, पानी संकट

ज़रीना की बात काटते हुए एक बुज़ुर्ग महिला कहती हैं, ''हमें क्या पता बीजेपी ने किया या नहीं. हम तो जेई साहब को जानते हैं वही आए थे पाइप बिछवा कर गए. हम तो ना कहेंगे बीजेपी ने किया है, हमें क्या पता. ''

यहां पानी भरना महिलाओं का काम है. वह सुबह से शाम तक पानी ही भरती है. इस दौरान वो दोपहर में महज़ एक घंटे आराम करती हैं. पानी लाने के इस काम के कारण गांव की बच्चियां अपने सपनों का गला ख़ुद घोंट देती हैं.

सुनीता इनमें से एक हैं. 18 साल की सुनीता पढ़ना चाहती थीं. लेकिन 10वीं के बाद वो पढ़ नहीं सकी. वो हर दिन सुबह उठकर पानी भरने निकल जाती है और पूरे दिन में कई दफ़ा सिर पर बाल्टी लादकर उन्हें पानी लाना पड़ता है. अपने घर वालों की पानी की ज़रूरत पूरा करने का बोझ उन पर इतना हावी हो गया कि वो आगे नहीं पढ़ सकीं.

नूंह, पानी संकटImage caption18 साल की सुनीता पानी भरने के कारण पढ़ नहीं सकीं

मेवात के इन गांवों की पगडंडियों पर दिन के किसी भी वक़्त बस दो चीज़ें ही नज़र आती है. एक तो पानी से भरे टैंकर और दूसरा बड़े-बड़े पानी के बर्तन ढोतीं हर उम्र की महिलाएं.

चार साल की बच्ची जो ठीक से अपना नाम भी नहीं बता पाती वो भी पानी के घड़े भरती है.

नूंह, पानी संकट

मेवात का पिछड़ापन, पानी के लिए हर दिन एक संघर्ष किसी एक सरकार की अनदेखी का नतीजा नहीं है.

प्रशासन के इस उदासीन रवैये के कारण इन लोगों को अब अपने नेताओं से भी उम्मीद नहीं है.

गांव गंडुरी, जहां लोगों ने अपने नेताओं को नहीं देखा

इसके बाद हम नगीना ब्लॉक के दूसरे गांव गंडुरी पहुंचे. इस गांव के हालात और भी ज़्यादा भयानक हैं. यहां एक भी सरकारी कुंडा नहीं है, ऐसे में या तो लोग खारा पानी पीने को मजबूर है या उन्हें पैसे देकर टैंकर मंगवाना पड़ता है.

हम गांव में दाख़िल हुए तो हमारी मुलक़ात एक महिला से हुई. जो अपने बच्चों के साथ कुंए से पानी भर रही थी. जब हमने इस कुंए में झांक कर पानी देखना चाहा तो तलहटी में ज़रा सा पानी था. ये महिला पानी नहीं ख़रीद सकती थी लिहाज़ा आज उसे यही खारा पानी पीना था. हमने जब उस महिला से बात करनी चाही तो उसने घूंघट कर लिया और ईशारे से हमसे ना बात करने की इच्छा ज़ाहिर की.

नूंह, पानी संकट

इस गांव में हमें शर्फ़ुद्दीन नाम के एक किसान मिले. पानी को लेकर मेरा सवाल अभी ख़त्म भी नहीं हुआ था कि उन्होंने कहा, ''मैडम कुछ नहीं होना है, ये लोग इलेक्शनों के वक़्त आते हैं. बोल कर जाते हैं ये काम होएगा, बिलकुल पक्का होएगा. कहकर चले जाते हैं हमारे वोट से जीत जाते हैं लेकिन काम कोई नहीं करता. हमारे यहां तो सरकारी कुंडा भी नहीं हैं. सबने अपने कुंडे बनवाए हैं और भरवा भी हम ही रहे हैं. 1000-1500 रुपये तो एक बार टैंकर में लग जाता है. यहां इंद्रजीत जी (गुरूग्राम सीट से सांसद) तो आए ही नहीं. मेवात के नाम से ही नहीं आते नेता लोग. अगर कोई नेता हमारी परेशानी दूर दे तो सबसे पहले हम मांग करते हैं कि पानी की परेशानी हमारी दूर कर दो. नेताओं का क्या हैं जिस भी दल के हों काम तो ना किया हमारे लिये. मजबूरी है हम वोट भी देतें हैं हमारी कोई सुनता भी नहीं है. ''

नूंह, पानी संकटImage captionसर्फ़ुद्दीन साल में सिर्फ एक बार सरसों की फ़सल उगाते हैं और खेती के लिए पूरी तरह बारिश पर निर्भर रहते हैं.

शर्फ़ुद्दीन साल में सिर्फ एक बार सरसों की फ़सल उगाते हैं और खेती के लिए पूरी तरह बारिश पर निर्भर रहते हैं, लेकिन अगर बारिश ना हो तो इन्हें खारे पानी से सिंचाई करनी पड़ती है और कई बार इसकी वजह से उनकी फ़सल भी बर्बाद हो जाती है.

इस गांव के लोगों को हर सरकार और राजनीतिक दल से शिकायत है लेकिन ये लोग ओम प्रकाश चौटाला की तारीफ़ करते नज़र आए. इनेलो सरकार की वृद्धा पेंशन योजना के तहत मिलने वाले प्रति माह 2000 रुपये को ये लोग चौटाला सरकार का तोहफ़ा बताते हैं. एक बुज़ुर्ग महिला कहती हैं कि इब 2000 रुपयो मिले तो बच्चण के बीच थोड़ा मान-सम्मान मिले है.

बिना पानी-बिजली वाला स्कूल

ऐसे गांव जहां पीने तक को पानी नहीं है वहां स्कूलों को चलाना एक बड़ी चुनौती है. स्कूल तो सरकार ने बना दिए लेकिन बच्चों को ना पानी दिया गया ना बिजली. गंडुरी गांव के सरकारी विद्यालय में बिजली का कनेक्शन ही नहीं है. देश के आख़िरी गांव तक बिजली पहुंचाने के सरकार के वादे की सच्चाई ये स्कूल बयां करता है.

नूंह, पानी संकटImage captionगंडुरी गांव का स्कूल

इस स्कूल के प्राइमरी हेड मास्टर मोहम्मद सिद्दीक कहते हैं, ''गंडुरी ही नहीं पूरे मेवात में पानी सबसे बड़ा मुद्दा है. हर स्कूल की यही समस्या है. स्कूल में टैंकर से पानी मंगाते हैं. लेकिन इसके लिए सरकारी मदद नहीं मिलती. हम सारे टीचर मिलकर कुछ पैसे जोड़ते हैं और पानी का टैंकर मंगवाते हैं. जब टैंकर का पानी वक्त पर नहीं आता है तो मैं अपने घर से मयूर जग में 20 लीटर पानी भर कर लाता हूं. कभी कभी पानी ना होने के कारण बच्चों की छुट्टी करनी पड़ती है. ''

साल 2007 में इस स्कूल की नई इमारत बनायी गई लेकिन इसमें बिजली का कनेक्शन अब तक नहीं दिया गया है.

नूंह, पानी संकट

क्या पानी का इंतज़ार कभी ख़त्म होगा?

मेवात के सामाजिक विकास और पानी की समस्या पर 25 सालों से काम कर रहे इतिहासकार सिद्दीक मोहम्मद कहते हैं, ''मेवात में पानी की योजनाएं दो बार बनी एक बार बंसीलाल जी ने घनतरी गांव से शुरू की थी लेकिन वह लागू नहीं हो सका. इसके बाद ओम प्रकाश चौटाला साल 2003-04 में रेनीवैल परियोजना लेकर आए. चौटाला सरकार जाने के बाद कांग्रेस की सरकार आई और उसने इस योजना का नाम राजीव गांधी पेयजल योजना रखा और इसे लागू कराया. इस योजना के तहत पुन्हाना और नगीना के 52 गांव को कवर किया गया था. पहले चरण में 200 करोड़ के लगभग राशि ख़र्च की गई. फिर इस पर काम होना बंद हो गया.''

''अब साल 2018 में बीजेपी सरकार ने कहा है कि रेनीवेल को दोबारा लागू करेंगे और जिन गांवों में पानी नहीं पहुंचा है यानी दूसरे चरण के गांव को कवर करेंगे. हालांकि ये बजट कितना होगा. कब ये काम शुरू होगा ये सरकार ने अब तक नहीं बताया है.''

नूंह, पानी संकट

12 मई को हरियणा में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान होने हैं. और जब देश के सामने बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी, न्याय योजना जैसे वादे रखे जा रहे हैं तो मेवात के ये गांव अपने नेता से बस साफ़ और ज़रूरत भर पानी मांग रहे हैं. लेकिन क्या इस बार इनकी कोई सुनवाई होगी.

इन गांव वालों की परेशानियां पिछले 70 सालों से जारी हैं. इन्हें इंतज़ार है किसी ऐसे नेता का जो ना सिर्फ़ वादे ना करे बल्कि इन्हें साफ़ पानी दे सके.

इन गांवों में घूमते हुए साहिर की कुछ लाइनें याद आती हैं...

ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ

ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ

जिन्हे नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं?

 


Apr 25 2019 6:11AM
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Source: Phagwara Express News
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